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Hymn No. 1340 | Date: 15-Oct-1999
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ऐ जुल्मी ! जुल्म किए न जाने तुमने कितना हमपर, वास्ता देकर प्यार का ।
ऐ जुल्मी ! जुल्म किए न जाने तुमने कितना हमपर, वास्ता देकर प्यार का ।
यार माँगा होता गर तू शीश, तो एक ही झटके में दे देता बिना देर किए ।
आज माना कितना अभी बाकी है, साकी, गर तू है, तो न आने देंगे किसी को दिल में ।
प्यार करते समय जो ना सोचा था, अब कर लिया, तो क्या सोचना ।
हाँ से क्या लेना-देना, हम तो मशरूफ हो चुके है तेरे प्यार में ।
वादा खिलाफी का कोई इल्जाम ना दूंगा, प्यार के हर मौके पर तेरा नाम लूंगा ।
ढाता रहे तू कितने भी सितम, तेरे सिवाय कोई और ना होगा सितमगर मेरा ।
तेरा नाम जुड़ गया जो मेरे नाम से, मौत भी ना अलग कर सकेंगी उसे ।
यार दरिया में डाल, या पर्वत से फेंक, महफूज रहूँगा तेरे प्यार में ।
हद हो जाएगी जुल्मों की, पर भय न फैलने दूँगा तेरे प्यार का ।


- डॉ.संतोष सिंह