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Hymn No. 1342 | Date: 16-Oct-1999
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बैरागी बनकर क्या करुँ, रह जाए जो मन में कोई राग ।
बैरागी बनकर क्या करुँ, रह जाए जो मन में कोई राग ।
बड़भागी बनकर क्या करुं, जो वंचित हो जाऊँ प्यार से तेरे ।
सनम-सपनों का क्या मतलब, जिनमें तू न आए कभी ।
सब की बातें कैसे करुँ, जो खुद को ठीक से न जान पाया ।
प्रेम की बातें क्या जानूँ, जब सँभले ना दिल बगैर तेरे ।
तेरे पास आकर क्या हुआ, जो दिल को खोलना न आया ।
नसीब था जो पहुँचा दर पर, बदनसीबी होगी, जो ना हुआ तेरा ।
काश की बात क्यों करुँ मैं, थामा है विश्वास से हाथ जो तेरा ।
मिटने के लिए तैयार हूँ मैं, मिटना जो हो तेरे लिए ।
मिले भीख में या पुरुषार्थ से, कोई मतलब नहीं, रहबर जब तुझे पा गया ।


- डॉ.संतोष सिंह