Hymn No. 1343 | Date: 16-Oct-1999
मेरा मुख तरसता देखने को तेरी सूरत, जो बन गई है मेरी जरुरत ।
मेरा मुख तरसता देखने को तेरी सूरत, जो बन गई है मेरी जरुरत । जाना तो तुझको कभी से, पहचानना न आया, छूपता है तू कैसे कण-कण में । मुलाकात हुई कई बार, फिर भी तरसता है मन, दिल जाने नही बिछुडता है तू क्यों । वादा करके कई बार तोड़ा, पर तुमने पर मुख ना मोडा, सीखा दे तू वादा निभाना हमको । प्यादा हूँ मैं तेरा बहुत पुराना, पर तेरा कहाँ हुआ, कैसे करना ये न जाना । बेमिसाल है तू, उतना ही तेरा हृदय विशाल, करता नही कहा तेरा, बस बाते बनाता मैं । कीया है तुमने हमारे मन की, फिर भी दोष देने से तुझे बाज न आता । जताते तो है हम भी बहुत प्यार, पर कर्मों से पहुंचाते है तेरे दिल को आहत । बस एक बात मान ले, छीन ले मेरा सारा ज्ञान तू अज्ञानी बने रहे तेरे ध्यान में ना रहे आँखो में ज्योती, हो दिल में झगमग, निहारूँ जिसमें छवि तेरी । हर इंद्रिय हो बेकार, आकार देती रहूँ तुझको, अपने सपनों के संसार में । क्या फर्क पड़ता है, जो मिट गया मैं, मिटने से जो मिल जाएगा तेरा ठिकाना ।
- डॉ.संतोष सिंह
|