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Hymn No. 1346 | Date: 16-Oct-1999
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गुनगुनाते हुए देखा हर किसी को, अपनी धून में तेरा नाम ।
गुनगुनाते हुए देखा हर किसी को, अपनी धून में तेरा नाम ।
पक्षियों को कलरव का शोर करके, लेते हुए देखा तेरा नाम ।
भौरों को गुनगुनाते देखा, तूझे याद करके फूलों का रसपान करते हुए ।
बागों-खलिहानों में लहलहाते देखा, पेड-पौधों को तेरी यादों में ।
जर्रा-जर्रा इस धरा का डूबा हुआ है मस्ती भरे आनंद में तेरे ।
ये कौन-सा लगा है रोग मानव को, जो रोता है सुख-दुःख के थपेडों में ।
बता दे कोई नया गुर ऐसा, जो सीख जाए शाश्वत आनंद का राज वह ।
होगी बहुत-सी कमियाँ पर आया है धरा पर तेरा हमरूप बनकर ।
जान पर बन आयी है जो भूला अपने निजस्वरूप को वह ।
आहत हुए तन-मन को, मिलती है राहत सानिध्य में तेरे ।


- डॉ.संतोष सिंह