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Hymn No. 1354 | Date: 26-Oct-1999
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कौन किसके आगे झुका, जान न पाया झुकानेवाला इसे ।
कौन किसके आगे झुका, जान न पाया झुकानेवाला इसे ।
मौन रहके क्या फायदा, जो पीना न आया प्यार का प्याला ।
पागलपन कहते है अगर इसे, तो मैं पागल ही भला ।
जो अंत ना हो खुद का खुदा में, उस सजदा का क्या फायदा ।
आग का दरिया है गर प्यार, तो पार करने से चुकनेवाला नही ।
छुटा है साथ सबका, पकडा जो इकबार हाथ उसका, रूकनेवाला नही ।
होने को तो होकर ना रहते है सभी, ना रहकर होता है वह यही ।
कुछ गजब है प्यार की कहानी, जो किया वह भी बन गया अजब ।
वश में रहता नहीं अपने आप में, तन में रहकर भी पास रहता है खुदा के ।


- डॉ.संतोष सिंह