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Hymn No. 1356 | Date: 27-Oct-1999
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खेल है तेरा ये अनोखा, जगत जेल है तेरे हाथों बनाया हुआ ।
खेल है तेरा ये अनोखा, जगत जेल है तेरे हाथों बनाया हुआ ।
आते है हम कई-कई बार कर्मो का भार लेकर नया-नया स्वांग रचाने ।
जन्मते ही ढकती है आँखें माया से, तेरा बताया हुआ जाते है भूल ।
धूलमय जीवन को सजाना चाहते है संसार के कण-कण से ।
शाश्वत को भूलाके रखते है विश्वास दिल में, टूटने पर देते है दोष तुझी को ।
कैसे आया? क्यों? आया शुरुआत-अंत क्यों है जरूरी? दे-दे जवाब आज तू ।
तू भी कई-कई बार आया मानव तन में, रहकर रीझाना सिखाया परम को ।
यूँ ही क्यों कि शुरुआत इस खेल की, पीड़ा और आनंद का झमेला क्यों ।
मेला लगाया भाँती-भाँती का तुमने, तो क्यों होता है यहाँ हर दिल अकेला ?
छटपटा रहा हूँ जेल में, मेल ना है मेरा तेरे सिवाय किसी और से ।


- डॉ.संतोष सिंह