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Hymn No. 1357 | Date: 28-Oct-1999
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रूकना नहीं, झुकना नही, तेरे सिवाय किसी का सुनना नही ।
रूकना नहीं, झुकना नही, तेरे सिवाय किसी का सुनना नही ।
जीवन देनेवाला तू, लेनेवाला तू, फिर मेरे कहे से क्या हुआ ।
बातें बनाता नही, दिल की बात हूँ, सुनाता, डाल के गीतों में तुझे ।
कितना भी कर लूँ कुछ ना है मेरा, तुझसे पाया, अर्पित किया, हो गया तेरा ।
मजबूर बन गए है कर्मो का ढोल बाँधकर, जग में भटकने के वास्ते ।
बंद है हम चमड़े के थैले में, जो रहे है अभिशप्त इच्छाओं को लेकर ।
शाश्वत पाया तेरा अनुपम सान्निध्य, तो जाना आनंद कहते है, किसे ।
हमको पड़ी है आदतें कई-कई जनमों की, जैसे सूकर को भाता है कीच में रहना
देना तू आशीष, पार कर जाएँगे पुरुषार्थ के सहारे जन्म-मरण के खेल को ।
तन-मन को डूबा देंगे तूझमें, तेरे ठिकाने पहुँचने के वास्ते मिटा देंगे खुद को ।


- डॉ.संतोष सिंह