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Hymn No. 1359 | Date: 28-Oct-1999
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माना कि इस शहर में हर कोई है तेरा दीवाना, उनके प्रेम में रहता है तू महफूज सुबह शाम।
माना कि इस शहर में हर कोई है तेरा दीवाना, उनके प्रेम में रहता है तू महफूज सुबह शाम।
पिछा सा में जलता रहता भीतर ही, ख्वाब देखूँ चरणों में तेरे रहने के वास्ते ।
हँसी आती है खुद पे जब औरों को देखता हूँ, जैसे मलमल के सामने टाट का कोई टुकड़ा
तेरे वास्ते क्या ना करते है वो सब, यहाँ तो खोये रहते है बस ख्वाबों – ख्यालों में ।
प्रेम में रहते है खोये वे इतना, लुटाते है तुझपे हर वक्त सब कुछ अपना।
ओर इक् हम है जो इस ताक में रहते, कब तुझसे कुछ ना कुछ पा लें ।
कैसे सहता है तू इस बज्र बेहया को, दे दें श्राप जनमों जनम का इक् ही बार ।
मान गये प्रभु जानता है तू सब कुछ, फिर भी आने देता है इस कुटिल को पास अपने ।
बदलना चाहा, बदलना न आया, अरे तेरे किये हुये पे पानी फेरा कई-कई बार ।
बहुत से बहुतों को देखा होगा प्रभु, पर रावण कंस भी शरमाये मुझ जैसे की करतूतों पे ।


- डॉ.संतोष सिंह