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Hymn No. 1360 | Date: 29-Oct-1999
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लगा है रोग इश्क का, दर्द दवा है तू सब कुछ ।
लगा है रोग इश्क का, दर्द दवा है तू सब कुछ ।
बड़ता जा रहा है मर्ज धीरे–धीरे, होश रहते हुये बहोश से रहते है हम।
कोई शिकवा – शिकायत ना है किसी से, जल्दी से ले ले आगोश में हमें।
इश्क भीतर है, इश्क बाहर, इश्क के पास जाना है इश्क बनके हमें ।
क्या थे क्या होगा इश्क के फेरे में होगा हलाल तन तो कोई ग़म नहीं ।
बहारें आती है हर बार, चमन खिलता है बारम्बार, इश्क होता है एक बार।
बहुत जी लिया बगैर इश्क के, अब तो कबूल है मरना इश्क की खातिर ।
मैं शातिर बढ़ा बहुत ही खराब, पर दीवाना तेरा कर ले ईश्क स्वीकार मेरा।
बेपरवाह होके रहना चाहूँ, इश्क में इश्क बनके जीना चाहूँ ।


- डॉ.संतोष सिंह