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Hymn No. 1364 | Date: 30-Oct-1999
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इकजोर दे, हिलोर दे, मेरे बाहर – भीतर को कर दे तू एक।
इकजोर दे, हिलोर दे, मेरे बाहर – भीतर को कर दे तू एक।
बहोश सा था मैं, होश में आने लगा, ज्यों-ज्यों तेरे पास आता गया।
जो था साकार सब हुआ बेकार, तेरी कृपा से निराकार में मजा आने लगा।
मजा लेने के लिये कुछ होना होता था जरूरी, तेरी मस्ती में यूं ही मजा आने लगा।
पहले की चाहत मिटने लगी इक्-इक् करके, जब चाहत का रूप ले लिया तूने।
हँसी आती है दुनिया पे उनसे ज्यादा अपने आप पे जो जीवन मूल्य बदल गया।
डरा-डरा सा रहता था पहले, आज हर पल मौत से छेड़खानी करने का है दिल करता।
ना रह गया भरोसा मिटनें वालें पे, शाश्वत बनके आ गया जो तू।
होने वाला होगा अभी बहुत कुछ, इतने में मैं मस्त हो गया हूँ।
प्रभु प्यार के बार में सुन रखा था, अब वो नजर आने लग गया।


- डॉ.संतोष सिंह