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Hymn No. 1365 | Date: 01-Nov-1999
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पुकारा जब-जब तुझे, पास पाया पलक झपकते अपने।
पुकारा जब-जब तुझे, पास पाया पलक झपकते अपने।
सपने में ना जो सोचा था, तेरी कृपा से जीवन में घटने लगा।
आसरा ढूँढता फिरता था मैं, आसार मिला चरणों में तेरे।
लायक न था किसी काम का, सरंजाम दिया आसरे तेरे।
निपट अकेला कुछ ना कुद किया करता था बिना किसी हेतु के।
राह तूने दिखाया मंजिल की झलक दिखाके बड़ना सिखाया।
यूँ ही गुजरती हुयी जिंदगी को मिला मकसद कुछ करने का।
दिलो–दिमाग से बड़ चले, मंजिल को फतह करने की ओर।
जोर ना चलता था किसीपे, कमजोर थे हम इतने।
मिलते ही आशीष तेरी, नाचीज़ ने कर दिखाया हर काम को।


- डॉ.संतोष सिंह