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Hymn No. 138 | Date: 09-Mar-1998
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उडते हुये उन्मुक्त पंक्षी है हम; सीमाओं से परे अनंत गगन है तू;
उडते हुये उन्मुक्त पंक्षी है हम; सीमाओं से परे अनंत गगन है तू;
इच्छाओं से बचे है पंख हमारे; फिर भी फडफडाते है तेरे पास आने को ।
चाहते हैं हम तूझे मन ही मन, अपनी भावनाओं में बाँध न पायें तूझे
कुकर्मों की गहरी खाई में फँसे थे हम तेरी सद्इच्छा से बाहर आये ।
दोषमुक्त होना चाहते थे, निर्बल था तन मन हमारा, सहारा पाके तेरा सबल बने हम ।
जब – जब हाथ बढाया साथ तेरा सदा पाया, अविश्वास के चलते साथ छूटा हमारा ।
बहुत हो गया रोना रोना अपना, अब तो तेरे गीतों को है गाना।
नहीं जाना किसी ओर, तेरे लिये आये है तेरा बनके है रह जाना।


- डॉ.संतोष सिंह