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Hymn No. 1370 | Date: 05-Nov-1999
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ये शहर हें दीवाना तेरा, पूजते तुझको भाँति–भाँति के रूपों में।
ये शहर हें दीवाना तेरा, पूजते तुझको भाँति–भाँति के रूपों में।
भोलापन है इनमें कितना, तुझे मनाने के वास्ते बन जाता लीक का फकीर मैं।
इक बार जिस स्वरूप में जो आके दिया समझा तूने उसके सिवाय न माना कुछ।
तोहमत मत लगा तू इनपे, देखंना हें तो देख भक्ति की बनागी इनमें।
तेरे वास्ते भार के पहले लगाते है लाईन और रहते है भूखे दिन भर।
जितना दीया तूने समझ उससे भी ज्यादा करमा चाहते है तेरे वास्ते।
पास में छोड़के – दूर – दूर की यात्रा करके ना पहुँचते है पास तेरे।
पीसते हुये जीवन की चक्की में, कुछ माँग लिया तुझसे तो क्या बुरा किया।
तेरा कहा हुआ माना शाश्वत सच है, पर इन्होंने तो जाना वो तो झूठ नहीं।
हर ले तू इनके सारे तप को, दे दें जीवन में खुशियों के पल अनेक।


- डॉ.संतोष सिंह