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Hymn No. 1374 | Date: 11-Nov-1999
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तरह – तरह के गीत फूट रहे है मन में मेरे।
तरह – तरह के गीत फूट रहे है मन में मेरे।
जीवन और मौत–दूर ना कर सकता है कोई मुझको – तुझसे।
सनक कह ले या प्यार, रह नहीं पाता मैं अब अकेले।
घूरती है सवालिया निगाहें, मुझको देखके क्रिया-कलापों को तेरे।
बेखबर हो गया हूँ तुझमें, खबर कोई छू ना है पाती।
अपने साँवरे के प्यार में, मैं तो हो चुका हूँ बाँवरा।
ना है चाहत अबकुछ बनने की, जो मस्ती चढ़ी है प्यार में तेरे।
भीड़ में भी हो जाता हूँ निपट अकेला, याद आते ही तेरी।
पड़ा ना है मुझको करने की चर्चा तेरे प्यार की किसीसे।
चर्चा किये बिन् रह नहीं पाता मेरा दिल, तेरे प्यार की।


- डॉ.संतोष सिंह