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Hymn No. 134 | Date: 10-Mar-1998
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मुझे पता है प्रभु हमारे चित्त के कीसी कोनें में तू है जरूर,
मुझे पता है प्रभु हमारे चित्त के कीसी कोनें में तू है जरूर,
फिर भी ढूँढते फिरते रहते है संसार की मायावी गलियों में ।
मन के फेरें में पड़के कर्मों का जाल बुनते रहते है अपने लिये ;
सीधे सरल तेरे दर की राह पकडकें क्यों नहीं आतें है तेरी ओर ।
करम तो करते है तेरे बहुत कहने पे, जेहन में तेरी बात रख नहीं पातें क्यों
सुध रहते हुये बेसुध होते है अजीबों गरीब ख्वाबों के पीछे ।
मंजिल को पहचानते हुये, कदम का रूख दूसरी ओर क्यों मुड जाता है ।
आँखों से आँसू बहते है कई - कई बार, वासनाओं के कारोबार में फँसने पर ।
अपने भावों का रूख तेरी और क्यों नहीं मोड पाते है ।
बंजर हुआ ना है दिल हमारा, तेरे प्रेम से ओत – प्रोत होता रहता है।
इस जमीं पे हमाके बस है एक तेरा सहारा इसका अहसास कब होगा ।
तेरे दर पे ना देर है ना अंधेर, हमें तो बस इंतजार है तेरा ।


- डॉ.संतोष सिंह