VIEW HYMN

Hymn No. 135 | Date: 10-Mar-1998
Text Size
प्रभु तूम यहाँ भी, वहाँ भी इस सारे जहाँ में बसते हो,
प्रभु तूम यहाँ भी, वहाँ भी इस सारे जहाँ में बसते हो,
रचते हो जिनको तूम, उनमें तूम ही तो बसते हो ।
फिर क्यों नहीं देख पाते है हम, तूम्हें अपनी क्षुद्र नजरों से;
तूम्हारा साथ क्यों नहीं पाते है हर पल ।
असहाय है, हम की असहाय है तू जो करीब आ नहीं पाता हमारे;
नियम तेरे इतने कडे क्यों है या तू पास आ जा, या बुला लें तेरे करीब ।
कर्में से अगर दुरी बढती है तो क्यों भेजा कर्मों के संसार में ;
मन इतना क्यों चंचल होता है तेरे लिये, कभी तेरे जग के फेरे में ।
धर्म तुने दिलों को तोड़ने के लिये बनाया, या दिलों को जोडने के लिये;
तेरी हर बात क्यों होती है इतनी उलझी क्या हम नहीं चाहते सुलझाना ।


- डॉ.संतोष सिंह