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Hymn No. 136 | Date: 12-Mar-1998
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मुझे नहीं पता, मुझे नहीं पता प्रभु मुझें कुछ नहीं पता ।
मुझे नहीं पता, मुझे नहीं पता प्रभु मुझें कुछ नहीं पता ।
लाख जानता हूँ मैं तूझे, पर सचमुच मुझें कुछ नही पता ।
दिल की हालत है ऐसी चाहता है साथ तेरा हर पल ।
क्यां करना चाहियें, आता नहीं हमें कुछ सचमुच मुझे कुछ नहीं पता ।
मन मानता नहीं तेरे सिवाय, प्यार में तेरे कुछ – कुछ पहचानता है ।
मगर भटक क्यां हूँ जाता, सचमुच मुझे कुछ नहीं पता ।
शरारत करता हूँ लोगों से तेरा ख्याल कर – करके ।
न जाने कब बहक जाता हूँ, सचमुच मुझे कुछ नहीं पता ।
सताता हूँ मैं खुद को, तेरा बन जाने के लिये इच्छा है मेरी बहुत पुरानी ।
पता नहीं क्योँ रह जाती है अधूरी, सचमुच मुझें कुछ नहीं पता ।


- डॉ.संतोष सिंह