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Hymn No. 1377 | Date: 13-Nov-1999
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जनमों–जनम का प्यासा भटकता हुआ पहुँचा पास तेरे।
जनमों–जनम का प्यासा भटकता हुआ पहुँचा पास तेरे।
रास्ते बदले कई - कईबार, बदली ना मंजिल एक भी बार ।
नैन रहते हुये हूँ अंधा, जोर ना चलता दिल पे अपने।
सपनों में तू आये कैसें, जो नींद ना आने देता तू।
हालत है चित्र-विचित्र मेरा, उससे भी अलग किस्मत।
दे रहा हूँ दस्तक तेरे दर पे, खोल दे किवाढ़ा तू अपना।
दिल को राहत मिलेगी जो हो जायेगा दीदार यार का।
सुबह हो या शाम किया है हमने तुझको प्यार से याद।
गँवारा है हम को सब कुछ, गँवारा ना है रहना बिना तेरे।
तड़प मिटाने के लिये ना कहता हूँ, अब आता है मना तड़पने में।


- डॉ.संतोष सिंह