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Hymn No. 1379 | Date: 15-Nov-1999
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चला हूँ मंजिल की तलाश में, राह की पहचान किये बगैर।
चला हूँ मंजिल की तलाश में, राह की पहचान किये बगैर।
आँख होते हुये हूँ अंधा, दीदार होगा जब तेरा तो पहचानेंगे कैसे।
मोहब्बत की ज्योत है दिल में, उसीके सहारे बनायेगे तुझे।
ऐसी कोई विशेषता ना है हममें, जो मजबूर कर दे अपना कहने को तूझे।
मस्तानों की महफिल में पहुँचा हूँ, इक बाँवरा है जो आधा-अधूरा है।
पूरजोर कोशिश होगी हमारी जो है आधा अधूरा ज्ञान मिट जाये, रह लेंगे पास पागल बनके तेरे।
तेरा कहा हुआ करेंगे, चरणों को सब कुछ अपना समझेंगे।
तुझे निहारने की ना करेंगे जुर्रत, तेरे छाया में रहके अपनी छाया ना पड़ने देंगे तुझपे।
तेरे सिवाय कोई ना है सहारा, अनोखा है तू सबसे प्यारा।
जो भी होगा मेरा तेरे हाथों, स्वीकार ना करूँगा किसी और का कुछ।


- डॉ.संतोष सिंह