Hymn No. 1383 | Date: 15-Nov-1999
कुछ और, कुछ और, कुछ और, प्यार के दौर में चाहता हूँ हर पल कुछ और।
कुछ और, कुछ और, कुछ और, प्यार के दौर में चाहता हूँ हर पल कुछ और। पाना चाहता हूँ प्यार में कुछ और, सब कुछ को छोड़के पाना चाहता हूँ कुछ और। तैयार हूँ हर दर्द को बोलनें के वास्ते, पर रोढ़ा न डालना मेरे प्यार के राह में। कमजोर हूँ कितना भी डरूंगा ना किसी से, करुँगा वो सब कुछ जिससे मिले कुछ और। कुछ भी समझ कोई बात नहीं, कुछ भी ना मेरे प्यार को लेके तू। मौका परस्त हूँ या लालची, होगी कोई और कमी, तेरे प्यार में कुछ और कभी ना है रहती। इंसां मैं जमीं का, निभाना पड़ता है हर दस्तूर यहाँ का, प्रभु तेरे यहाँ तो है सब कुछ सहज। महूज मिलता नहीं कुछ भी, यहाँ बनाया हुआँ है तेरा नियम, कुछ पाने के लिये करना चाहूँ कुछ और सही क्या है, क्या है गलत मुझे ना है कुछ पता, जो कुछ है करना वो पड़ेगा तुझमें करवाना कुछ मार के वास्ते। राम भरोसे है मेरी गाड़ी, जनमों – जनम का मैं अनाड़ी, इस जग में तू ही है एक खिलाड़ी।
- डॉ.संतोष सिंह
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