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Hymn No. 1392 | Date: 18-Nov-1999
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तड़प रहा हूँ प्यार में, भटक रहा हूँ इधर–उघर तेरे वास्ते।
तड़प रहा हूँ प्यार में, भटक रहा हूँ इधर–उघर तेरे वास्ते।
कैसे कहूँ हाल दिल का, आते ही लब पे, अवरूध्द हो जाते है कंठ मेरे।
उत्कंठित मन को चैन मिले तो मिले कैसे, मिलने को रहता है वो बेचैन।
क्षमा चाहता हूँ मचलते हुये दिल को रोक नहीं पाता तेरे वास्ते।
नीयत ना है इतनी खराब, जो आने रोक देता हें तू मुझे।
सालता है तेरा व्यवहार, जो प्यार भी करता और तड़पाता है हमको।
मिले तो है कई बार हम फिर भी न जानं पाया अब तक तुझे।
ये कैसा प्यार है जिसे लेके हो जाता हूँ बहुत बार हैरान।
अब तक न जानता था अपनी गलतियों को, जानके दूर न कर पाता हूँ।
जानते हुये ना बन तू अंजान, कर दे पूरी तू मेरी हर माँग।


- डॉ.संतोष सिंह