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Hymn No. 1393 | Date: 19-Nov-1999
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पाना चाहता हूँ तुझे, रोड़े है तेरे–मेरे बीच में अनेक।
पाना चाहता हूँ तुझे, रोड़े है तेरे–मेरे बीच में अनेक।
दूसरों का ना है कोई दोष, करवाता है मन मुझसे मनमानी।
विजय पाना चाहता हूँ, सुसुप्त काम भरी इच्छाओं पे।
जनमने–मरने को बाध्य करते है हमारे शुभ– अशुभ कर्म।
त्याग–ध्यान से परे जीना चाहता हूँ जीवन सहजता – सरलता से।
देखा जाये तो सहज – असहज में रहके, पर रहना चाहूँ इन सबसे परे।
मैं-मैं ना होके, अहम् की कोई बात ना हो – हो मुझमें ।
समझाना बड़ा है मुश्किल, अनुभूति हुयी जिसको जाना उसने इसे।
कार्य-कारण से परे मैं शाश्वत समुच्च ब्रह्माण्ड में जाने अनजाने रमता हूँ।


- डॉ.संतोष सिंह