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Hymn No. 1395 | Date: 20-Nov-1999
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निकला बाजार में खुद को बेचैन के वास्ते, आँकी लोगों ने मेरे तन की कीमत।
निकला बाजार में खुद को बेचैन के वास्ते, आँकी लोगों ने मेरे तन की कीमत।
कम थी मेरी कीमत मायावी दुनिया की चीजों से, भ्रम में जो रहता था टूटा वो भी।
दर्प से अकेले हुये नजरों से हिकारत बरसाते हुये, मेरी कीमत आँक रहे थे लोग।
मन ही मन ले रहा था मजा, तन कीमत ना है तेरी दौ कौड़ी की भी।
बाते सुनके हँस रहा था, नजरों में नजर डालके उनके भीतर झाँक रहा था।
खरीदने आये थे जो लोग मुझको, खाली थें पुरी तरह भीतर ही भीतर।
अपने खालीपन को भरना चाहते थें, हर बिकनेंवालों को खरीद – खरीदकें।
दम था उनका अपने पैसे पे, गम न था हमको जो बिक चुके थें तेरे हाथों में।
तन की गत जो बननी होगी वो बनायेगे, कुछ सालों में हमको वो फूँक आयेंगे।
बिकने से मेरे, हो जायेगी जरूरत किसीकी पूरी, दिल तो पहले से था तेरा तो स्पॉ है फर्क।


- डॉ.संतोष सिंह