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Hymn No. 1407 | Date: 26-Nov-1999
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खोया हुआँ मन है, मन के भीतर तू तेरे रहते कैसें कोई और आयेगा।
खोया हुआँ मन है, मन के भीतर तू तेरे रहते कैसें कोई और आयेगा।
दाग होंगे तन पे, बेदाग है दिल मेरा, जिसने किया है सिर्फ प्यार तुझसे।
खेला होगा खेल कितना भी तन ने, मन ने ना दिया साथ कभी मन से।
थक–हार के हर बार मन भाया सदा पास तेरे, प्यार किया मन ने दिल से तुझसे।
क्या बताऊँ कैसे कहूँ मन ने ना की मनमानी किसीसे, पर ईमान रहा तेरे वास्ते।
मत खड़ा कर सिर्फ सवाल तू मुझपे, हैरान हो जाता हूँ इस जहाँ में।
कहा हुआ करना चाहता हूँ तेरा, पता न कब कर जाता है चूक मैं।
ये खेल दोहराया गया इतनी बार, अब आती है शरम कहने से तुझे।
फिर भी कहूँगा ना खड़ा कर तू सवाल, कर लेनें दे प्यार तुझसे।
मेरा कसूर है बहुत, पर दिल तो रहता है चूर प्रिय प्यार में तेरे।


- डॉ.संतोष सिंह