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Hymn No. 1414 | Date: 28-Nov-1999
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प्रभु अब तुझे ढूँढ़ने जाना नहीं पड़ता, जब चाहता हूँ, पाता हूँ, पास तुझे।
प्रभु अब तुझे ढूँढ़ने जाना नहीं पड़ता, जब चाहता हूँ, पाता हूँ, पास तुझे।
काश करके जो करते थे सोचा, अब तो नजर आता है वो आस-पास।
जो बातें सुनके बंध जाती थी मेरी साँसे, समझने लगा अब उनका सार।
प्यार के बारे में सुन रखा था पास तेरे पहुँचने पे जाना क्या होता है प्यार।
हाथों से उड़ गये तोते, परम् तुझको जब नजर बचाके रहते देखा धरा पे।
परंपराओं को बनाने वाले, परंपराओं को तोड़के मान्यताओं को बदलते देखा।
अब समझ मैं आया क्यों कोई कैद कर न पाया तुझको किसी विशेष में।
बुत – अबुत से परे प्रभु मैंने तुझको देखा हर दिल से चुपचाप झाँकते हुये।
परिक्रमा जो ना किया अपने दिल का क्या फायदा करके परिक्रमा मंदिर – मस्जिदों की।
न बंधा कभी तू किसी एक धारणा में, सर्वव्याप्त तुझे तो बाँधा किसी विशाल दिलवाले ने।


- डॉ.संतोष सिंह