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Hymn No. 1421 | Date: 03-Dec-1999
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हर चाहत के परे इक् चाहत है तेरे प्यार में खो जाने की।
हर चाहत के परे इक् चाहत है तेरे प्यार में खो जाने की।
अजीब किस्म का इंसा हूँ मैं जो गुजारिश करे प्यार में पागल हो जाने की।
मुझको ना चाहिये पृथक सत्ता, मिट जाना चाहूँ तेरे प्यार भरे दामन में।
तंग होके ना कहता हूँ दुनिया से, चढ़ा है रंग तेरे प्यार का जो मुझपे।
अंग-अंग झूम रहा है मस्ती में, परवाना बन गया जो तेरे प्यार में।
काटा अगर किसी ने तो हो जायेगा दीवाना, देखके दिवानगी से भरे दिल को।
सारे फसाने खो जाते है, यह प्यार का अफसाना मिटके भी याद आयेगा।
होगी लाख शिकवा जमाने को हमसे, हमको ना फुरसत है प्यार से अपने।
सम्भलने की परवाह किसे, हम तो चूर है प्यार के नशे में सम्भालेगा यार मेरा।
मुझे ना है किसी बात का गुरूर, जब से छाया तेरे प्यार का सुरूर।


- डॉ.संतोष सिंह