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Hymn No. 1444 | Date: 14-Dec-1999
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सर झुका के क्या करुँ, जब दिल को दीदार ना हो यार का।
सर झुका के क्या करुँ, जब दिल को दीदार ना हो यार का।
प्यार करने का दावा कितना भी करुँ, जब तक खींच न पाये यार को।
कितना भी खुश रह लूँ तो क्या, जब तक मन यूँ ही ना रहे आनंद में।
वाजिब बनके क्या करूँ, जब तक अंदर से वाजिब रहना सीख न जाऊँ।
निकला हूँ राहे प्यार में, प्यार वास्ते खोना न आया यार में।
शायरी की बात करता हूँ, पर दिल में से ज्वार ना उमढ़ा प्यार का।
मिन्नतें करता हूँ हजार, पर सच्चा सजदा करना न आया एक बार।
भरा बैठा हूँ भीतर से, निकल जाना आया नहीं अपने आप में से।
कब अंत होगा अंतहीन मायुसियों से भरे दौर का, चले हमपे बस तेरा जोर।
औरों का मुझे मालूम न करना, उठ जाना है मुझको अपने प्यार वास्ते।


- डॉ.संतोष सिंह