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Hymn No. 1447 | Date: 16-Dec-1999
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मुझे ना है कुछ खबर, ना ही कुछ पता।
मुझे ना है कुछ खबर, ना ही कुछ पता।
मैं लायक ना ही किसी काम का, क्यों चाहेगा कोई मुझे।
अहसास है हूँ धरा पे बनके सबसे बढ़ा बोझ मैं।
जानूँ या न जानूँ बड़बड़ करना है मेरी आदत पुरानी।
एक् बार नहीं कई - कई बार नजरअंदाज हुआ नजरों से।
विशेष कुछ ना है मुझमें, सामान्य से बदतर हाल है मेरा।
प्रभु तु ही समझा, यहाँ – कहाँ दोष है तेरा।
देने को दिया तूने बुध्दियुक्त पूर्ण विकसित अंग मुझको।
फिर भी कुछ बनके तेरे दिल का सूनापन आया मुझे।
कहीं ना है दोष तेरा, जब हर दोष हो समाया मुझमें।


- डॉ.संतोष सिंह