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Hymn No. 141 | Date: 25-Mar-1998
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चाहत मेरी बस इतनी है, सम्मान से गुजारूँ ये जिंदगी;
चाहत मेरी बस इतनी है, सम्मान से गुजारूँ ये जिंदगी;
द्वार पे आये हुये की खाली झोली भर दूँ लेके नाम तेरा ।
दिन हो या रात हर पल जुटा रहूँ तेरे भक्तों की सेवा में;
चाहिये मुझे आशीर्वाद दिल में ना उठे संकोच तेरे दर पे आने को ।
अपने – पराये का भेद किये बिना सहज हो के मिलूँ सबसे ;
पल भर को बिन भूले ; हर कर्म करते हुये लेता रहूँ नाम तेरा ।
लाभ – हानि से मुक्त सिर्फ तेरे ख्यालों में विचरण करूँ;
इस जग में रहते हुये डूबा रहूँ तेरे गीतों में ।
जीतने को जीतूँ लेकें नाम तेरा इस संसार को ;
उससे पहले मैं तेरे दिल को जीतना चाहूँ ।


- डॉ.संतोष सिंह