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Hymn No. 142 | Date: 26-Mar-1998
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सौंपता हूँ तुझे अपनी हसरतों को, रहना चाहूँ मगन में तुझमें ;
सौंपता हूँ तुझे अपनी हसरतों को, रहना चाहूँ मगन में तुझमें ;
अपने कर्मों को करते हुये तुझमें खोया रहूँ, तेरा नाम लेता रहूँ ।
भूत और भविष्य की फिक्र मैं ना करूँ, मैं तन्हाँ रहूँ सिर्फ तेरे लिये ;
कुछ नहीं माँगता हूँ मैं तुझसे, मैं तुझको तुझसे हूँ माँगता ।
जन्नत का ख्वाब कभी देखा नहीं, तेरा साथ पाने का दिल करता है ।
गुप्तगु औरों से ना है करनी मुझे, मेरा हर राज जो तेरा है ।
ऐ मेरी मोहब्बत के मालिक, चाहता हूँ मैं तुझसे तेरी सोहबत का असर ।
अच्छे बुरे की बात ना करता हूँ, तू जैसा चाहें वैसा हो जाऊँ मैं ।
कहता नहीं हूँ मैं कुछ तुझसे, दिल ही दिल बात कहता हूँ तुझसे ।
सिखा नहीं सकता कोई मुझे सिवाय तेरे, तेरीं ही बात करता हूँ सबसे ।


- डॉ.संतोष सिंह