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Hymn No. 1474 | Date: 25-Dec-1999
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कैसे कहूँ मैं हूँ कुछ, जब भी गया ध्यान तो पाया कुछ भी नहीं।
कैसे कहूँ मैं हूँ कुछ, जब भी गया ध्यान तो पाया कुछ भी नहीं।
प्रकटा हूँ निराकार से लेके आकार, जिसमें इक् दिन हो जाना है गुम।
चूप नहीं बैठूँगा हर बात दिल की कह दूँगा, तेरी सत्ता का अविभाज्य अंग हूँ मैं।
आज नहीं रंगा तो क्या, इक् दिन रंग में रंग जाऊँगा तेरे, तेरा बन जाने के वास्ते।
मानूँगा नहीं बिन होके तेरा, हर पहचान अपनी मिटा दूंगा तूझमें खो जाने के वास्ते।
राह में आयें मुश्किलें चाहे हजार चला पड़ा तेरी और तो बिना पहुचें सकूंगा नहीं।
झूकाया है सर को तेरा प्यार पाने के वास्ते, कमजोर इतना नहीं जो कोई झूका दें इसे।
आवाज सूनके अनसूना ना कर सकता है तू, बंद कर ले चाहे आज कितना भी गुंजेगा दिल में तेरे।
बनके – मिटने का खेल हो गया तेरा पुराना, अबके मिटेगे तेरे प्यार में संवरने के वास्ते।
आगाह करता हूँ आज हुआ हूँ अनुरूप तेरे, तो तू भी होगा अनुरूप मेरे मिलन में।


- डॉ.संतोष सिंह