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Hymn No. 1479 | Date: 27-Dec-1999
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हें मारी रे, म्हारी, म्हारी रे रे मारी जगदंबे माँ, सिध्द अंबे मां।
हें मारी रे, म्हारी, म्हारी रे रे मारी जगदंबे माँ, सिध्द अंबे मां।

सांभणी ले जे तु मारा हया नी बात, कहेवा मागुं छूँ क्यारथी तारा थी।

वर्षों वित्या आ जग ने, हुँ क्या ना फरयों शोधतो तने आ जगत मा।

तू कईक कर या न कर पर सांभणी पड़से मारी हया नी वात ।

हे मारी रे मारी, हें मारी रे मारी जगदंबे माँ, सिध्द अंबे माँ।

क्यारथी दस्तक दऊ छु तारा दर ऊपर, सांभणी पड़शे मारी वात आज तने।

केम तु दूर राखे छे तारा पूग ने तारा थी, माँ तू केवी माँ छें।

रड़तो – रड़तो आखों सोजाय ने लाल थई गई, हयामां उठे भावों नो तूफाँ।

हे मारी रे मारी, ऐवी सी करी दीधी छे भूल, तने पुकारतो पुकारतो बेसी रहयो छें गडुं मारुं।

कई क्याँ तो खोंट छे मारा प्रेम मा, जो तू मने मलवा मारा थी तैयार नथी।

आ केवो खेंल छे ज्यां पूत्र ने हार कबूल करवी पड़े माँ नी सामें।

हें मारी रें मारी, समजावा निकणीयो ना छुँ, हुँ तो डूब वा मांगू तांरा हया नी गहराइयों मा।

माया नी जरूर तो लागे वारंवार, पर तारा प्रेम नी कीमंत ऊपर नही।

मने तू ढाली नांख तारी रीते, रहे ना आ संसार मां कई पण मारो वजूद।

हें मारी रे, मारी, हें मारी रे मारी जगदंबे माँ, सिध्दअंबे माँ।


- डॉ.संतोष सिंह