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Hymn No. 1482 | Date: 28-Dec-1999
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तेरे पास आते है एक से एक गुणवान – धनवान, माहिर हें सब अपने – अपने स्थान पे।
तेरे पास आते है एक से एक गुणवान – धनवान, माहिर हें सब अपने – अपने स्थान पे।
पर तूने मुझ जैसे खालिश निर्गुण को जिसके पास ना है कुछ, कैसे दिया स्थान।
सिहर जाता हूँ तेरा अनमोल प्यार पाके, कहीं तू मेरे कर्मों से अंजान तो नहीं।
इकट्टा किया है तूने एक से एक हीरा, कहाँ से आया बीच में इनके कोयले का टुकड़ा
तेरी कथनी – करनी, मुझ जैसे अज्ञानी को न आये समझ, कहीं धोखा तो ना दे रहा तुझे।
डरता है मेरा मन कहीं इस पापी के पाप से कुम्हला न जाये निर्मल दिल तेरा।
तेरी जरूरत है इस जहाँ में सभी को, हम तो थोपे गये सबपे सदा से।
योगदान है सब कुछ का कुछ न कुछ तेरे व्रूर लेनें दे योगदान उम्र का जो मिला तुझसे।
खुशीयाँ होगी चारों और तेरे साथ पल – पल गुजारने की, कोयलें से को आज नहीं तो कल होना है खाक।
अपने भाग्य में बदलाव देंखके शायद खिल जायेगा दिल उस निगुणें का।


- डॉ.संतोष सिंह