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Hymn No. 1483 | Date: 29-Dec-1999
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ना रख अब हमको अपने से दूर, कर लिया कर इक्बार दिन में मुलाकात तू जरूर।
ना रख अब हमको अपने से दूर, कर लिया कर इक्बार दिन में मुलाकात तू जरूर।
सुरूर छाया रहता है दिल पे तेरे प्यार का, पल-पल गुजारूँ बेचैनी में मुलाकात के वास्ते।
सुनीं आँखों से देखता हूँ तेरी राह, क्या पता कब हो जाये मुलाकात तुझसे।
मुकमल नहीं तो क्या, जानते हुये भी बाट जोहे मन मुलाकात की तुझसे।
इक् बार नहीं कई बार समझया दिल को, दिलदार तो रहता है सदा दिल में।
तड़पता है तेरे बगैंर इतना अपनी ही चाहत से आहत कर बैंठता है मन को।
लाख समझाया फिर भी समझ न पाया, कहाँ किया चूक की तू मिल न पाया।
जमीं पे रहता हूँ, कहीं ना कहीं की होगी चूक जो मेरे प्यार को खींच न पाया।
खींच दे बाहर – भीतर से तेरे प्यार से इतना, एक ही पुकार पे आने को विवश हो जाये तू।
अर्पण करूँ तो क्या करूँ तेरे प्यार पे, कुछ भी ना हें ऐसा जो लगे मेरा, मैं भी तो हो चुका हूँ तेरा।
- डॉ.संतोष सिंह
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तेरे पास आते है एक से एक गुणवान – धनवान, माहिर हें सब अपने – अपने स्थान पे।
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बिलकुल नहीं, बिलकुल नहीं विवश होके तू ना बुलाना हमको कभी पास अपने।
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