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Hymn No. 1485 | Date: 29-Dec-1999
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शौक है मुझको पूरा कर लेने दे तू उसे, जो जुड़ा है तुझसे।
शौक है मुझको पूरा कर लेने दे तू उसे, जो जुड़ा है तुझसे।
सजाना चाहता हूँ बेशकिमती साजों से तुझे जो पत्थर है तेरे वास्ते।
खिलाने का मन करता है विविध व्यंजनों को, जिसका कोई मतलब ना है तेरे वास्ते।
दिल करता है बहुत कुछ करने का तेरे संग, पर दिल्लगी ना लगे तुझको।
कसम से सनम खुद को बेचके तेरे अरमां गर है, तो पूरा करना चाहता हूँ।
कोई मेल मतलब ना है इस पागल के भावों का तेरे सत्य स्वरूप के आगे।
बेअर्थ पूर्ण है मेरे ख्वाब जो लेकें तुझे देखता हूँ रात – दिन।
माफ करना वास्ता प्रेम का देके मढ़ना चाहता हूँ अपने ख्वाब सर पे तेरे।
उपजा हुआ है सब कुछ तुझसे, कहाँ से लाऊँ कुछ अपना देने के वास्ते तुझे।
अहसास है मुझकों तेरे मेरे बीच की खाई का जिसे भरना चाहता हूँ भावों से।


- डॉ.संतोष सिंह