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Hymn No. 1486 | Date: 30-Dec-1999
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मैं अज्ञानी सबसे बढ़ा, कुछ भी ना मुझको पता।
मैं अज्ञानी सबसे बढ़ा, कुछ भी ना मुझको पता।
लेता हूँ नाम तेरी कृपा से, गाऊँ गीत तेरी दया से।
संसार के रस्मों – रिवाजों से ना है कोई वास्ता मेरा।
अजनबी है वो मेंरे लिये, अजनबी हूँ मैं उनके लिये।
आना चाहूँ मैं पास तेरे, पहुँचू क्यों कहीं ओर मैं।
मैं मानता नहीं कुछ तेरे सिवाय, तुझको मानके सबको करूँ प्रणाम।
आयाम दे दे मेरी भक्ति को, जो उब जाये पल-पल तेरे नाम में।
पीना चाहूँ जाम तेरे प्यार का, भाये ना मुझे कोई और।
कहना है तुझे तो कहे ले मुझे, दोष ना दे प्यार को।
दाग होगे तन – मन पे कई, पर बेदाग है प्यार मेरा।


- डॉ.संतोष सिंह