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Hymn No. 1489 | Date: 31-Dec-1999
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प्रभु समझा दे इस मन को जो करता है सदा मनमानी अपनी।
प्रभु समझा दे इस मन को जो करता है सदा मनमानी अपनी।
न जाने कहाँ कहाँ भटकता है जगत में, अनचाहे पे अटकता सदा।
अदा कर न पाऊँ इसकी चाहत को, क्षण भर बाद उचट जाता।
राहत पान जाये किसी एक से, ऐसा कुछ नजर नही आता।
इसकी मर्जी है जो ये करे, हमने भी ठाना इससे दूर रहने की।
इसका कहना बहुत बार है माना, अंत में हाथ कुछ न आया।
रहना पड़ेगा इसे मुताबिक मेंरे, नहीं तो करुँगा हाल बुरा।
माना जाल में फंसा कई - कई बार इसके, पर तोड़ा भी तो था हमने।
तू रहे सदा साथ तो कर दिखाऊँगा वो जो चाहा है तूने हमेशा।
निपट लेंगे हम इससे, चाहे कितना भी दुरूह हो पर रहे आशीष तेरा।


- डॉ.संतोष सिंह