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Hymn No. 1495 | Date: 05-Jan-2000
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बदलते – बदलते बदल जाना है प्रभु तेरे मुताबीक।
बदलते – बदलते बदल जाना है प्रभु तेरे मुताबीक।
चाम का स्वरूप हो कैसा भी, अंतर से है ढल जान तेरे मुताबिक।
बदलते – बदलते, बदलते रहना है बाहर भीतर से अनुरूप तेरे।
किसी की सोच वास्ते ना है बदलना, ना ही जिकर करना है बदलनें का।
आये गर मौत बदलते वक्त, निश्चिंत होके करना है कबूल तोहफा समझके।
पकके जब निकलेगा जब तू बदलने के साँच में से, बदलेगी जहाँ तेरे मुताबिक।
मिट जायेगा खेल बदलने – बदलवाने का, बेमल होके मेल होगा सबके संग तेरा।
हर की सता में मौजूद है तेरी अनंत सत्ता अनंत काल से।
समझ – समझका फेर होगा फिर भी दिल तेरा अभेद होगा।
तब तू ना मजबूर होगा बदलने के वास्ते, ना ही मजबूर होंगे हम बदलनें के लिये।
- डॉ.संतोष सिंह
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