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Hymn No. 146 | Date: 04-Apr-1998
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शिकायत, शिकायत, शिकायत हमको रहती है हर वक्त तुझसे शिकायत ।
शिकायत, शिकायत, शिकायत हमको रहती है हर वक्त तुझसे शिकायत ।
कुछ भी नहीं सुनते तेरी बाते, सिर्फ अपनी शिकायतों को सुनाते है तुझको ।
शिकायत करते रहते है दूसरों की हर वक्त ; अकेले हो या किसी के संग ।
काम कुछ बन जाये तो भी शिकायत है, ना बने तो है ही शिकायत ।
शिकायत अपनी और दूसरों की कर – करके जीवन को शिकायतों का ढेर बना देते है ।
शिकायत करते हुये आता है मजा, सजा पानें पर फिर करते है शिकायत ।
शिकायत गैरों की तो करते है, आदतवश हो के अपनों की भी शिकायत करते है ।
भूख लगने पर शिकायत खाते है, सोते वक्त शिकायत की चद्दर ओढके सो जाते है ।
फिर जब तेरे करीब आते है, तो खुद की शिकायतों का रोना रोते है ।
जिंदा होनें पर शिकायत लोगों की, लोगों से, मर गये तो भी शिकायत ।
इंसान हो या जानवर, ठंडी हो या गर्मी, हर चीज की शिकायत करते है ।
छोड़ा ना हमने पीछा शिकायत का, आगे शीकायत, पीछे शिकायत, इस सारे जहाँ से शिकायत।
इस खूबसूरत जिंदगी को शिकायतों के बीच कैद कर डाला, अपना नहीं दूसरों का दोष दे डाला ।
हाय शिकायत, हाय शिकायत, अपनी शिकायत, किस्मत की शिकायत, और तो और प्रभु की भी शिकायत करते है ।


- डॉ.संतोष सिंह