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Hymn No. 1499 | Date: 06-Jan-2000
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पत्थर को पूज – पूजके हो गया है प्रभु पत्थर दिल हमारा।
पत्थर को पूज – पूजके हो गया है प्रभु पत्थर दिल हमारा।
साकार करना चाहते है तुझे अपने महत्वकांक्षाओं की खातिर।
लेना – देना तुझसे ना है कुछ, करवाना चाहता हूँ अपने मन की।
लिप्त रहते है घोर कर्मों में, दे देके उसको धर्म का नाम।
मुक्त होने की बात है करते, मुक्त हो नहीं पाते मोह से।
आँखों पे बंधी है पट्टी माया की, दावा करते है पाने की तुझे।
जब भी तू आया रूप हाड़ - मांस का लेके, एतराज उठाया सबसे पहले।
धर्म को बाँटा जात के स्वरूपों में, प्रार्थना स्थल को बदला अखाड़ो में।
सच्चे दिल से उपजे प्रेम गीत को न मानके आलाप अलापा अलग – अलग।
खुद को न समझा, दूजो को बरगला के दावा किया तेरे होने का।


- डॉ.संतोष सिंह