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Hymn No. 148 | Date: 09-Apr-1998
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हम सब का तुं है नाथ, अनाथों का भी तू है नाथ ;
हम सब का तुं है नाथ, अनाथों का भी तू है नाथ ;
तेरे सिवाय् सब कुछ झूठा है, तू ही है परम् सत्य ।
आँखों से जो भी देखें वो तो है मिथ्या ज्ञान;
कानों ने जो सुना वो तो है माया की आवाज ।
हर बार इंद्रियाँ सुख के पीछे दौडे, इस संसार से नाता जोड़े;
कर्म थे ऐसे हमारे दूर तुझसे होते चले गये ।
मैं का अहंकार और अपने – परायें का बोध;
इतना गहरो बैठा देह में, भूल गये अपने मूल को ।
जकडा हुआ है आत्मा तन के पिंजड में;
सच्ची है नयनों की दो बूँदे जो गिरने को है बेचैन परम् पिता के चरणों में ।


- डॉ.संतोष सिंह