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Hymn No. 1521 | Date: 19-Jan-2000
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प्यार के सिवाय चाहत ना है दिल को कुछ और की।
प्यार के सिवाय चाहत ना है दिल को कुछ और की।
प्यार के सिवाय राहत दे नहीं पाता, मन को कोई और भी।
सुकून मिलता नहीं जब तक मुलाकात हो न जाये तुझसे।
खिला हुआ चमन बेजान सा लगता है प्रभु बगैर तेरे।
मिट जाती है सारी कडवाहटें जीवन की झलक पातें ही तेरे।
ये कैसा खेल है प्यार का जहा मतलब ना है हार-जीत का।
परवाह ना है हमे, तड़पे मेरा रेम – रोम प्यार के दौर में।
आजमाना तुझे है, हम तो मिट रहे है प्यार की मस्ती में।
तेरी हर हाँ में हाँ, ना में ना, खमखा में ना पड़ना है ना।
मोहताज ना रहा श्वासों का, जो बस गया तू मेंरे श्वासों में।


- डॉ.संतोष सिंह