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Hymn No. 1536 | Date: 27-Jan-2000
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प्रभु तेरा नाम संसार में कहाँ नहीं है।
प्रभु तेरा नाम संसार में कहाँ नहीं है।
जहाँ – जहाँ में गया किसी ना किसी रूप में विराजते पाया तुझे।
अनोखा है तेरा रूप, अनोखी है हर तेरी कथा।
जिसके दिल को जो लुभाया, प्रकट तू उसी रूप में हुआ।
तुझसे परे ना है कुछ संसार में, खेलता है खेल माया का।
संसार के कण – कण को रचाके बस गया तू संसार में।
निराकार को बदले आकार में, आकार से निरकार में।
हर भेद को मिटाके, रमता तू अपनी मौज में।
खोजे मिलता नहीं, दिल लगाने से मिल जाये हर कहीं।
अनुपम है तेरी कथा, लिखना मेंरे वश की बात नहीं।


- डॉ.संतोष सिंह