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Hymn No. 1541 | Date: 30-Jan-2000
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ढूंढता हूँ शब्द तेरी महिमा क्या करने के वास्ते।
ढूंढता हूँ शब्द तेरी महिमा क्या करने के वास्ते।
गुमेहो जाते है शब्द, अनंत में अनंत से आते –आते।
सताती है फिजाये हमको तेरे अद्भूत रूप की याद दिलाके।
प्यार और बढ़ जाती है दिल की तुझसे मुलाकात करने के वास्ते।
खता ऐसी कौंन सी हुयी थी, जो मन में लिये बैठा है तू।
भूला मैं सब कुछ, क्यों ना भूल पाता है तू अब तक।
जताना सीख रहा हूँ तुझसे, कैसे करना इनकार – इकरार।
साथ रहके कैसे तड़पाते रहना है दिल को।
कहना क्या है तुझे, कह जायेगे गुजारे गये लम्हों को याद करके।
वास्ता ना देंगे प्यार का तुझे, जी लेगे इकतरफा प्यार कर करके।


- डॉ.संतोष सिंह