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Hymn No. 151 | Date: 23-Apr-1998
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प्रिय पिता जग घूमा, मन बहुत भटका, पर कहीं नहीं अटका;
प्रिय पिता जग घूमा, मन बहुत भटका, पर कहीं नहीं अटका;
थक जाने के बाद मैं तेरी ही शरण में आया ।
सच कहता हूँ, जो भी अच्छा लगा, सिर्फ तनिक देर के लिये ;
पर तेरे साथ जितना रहा वो हर पलआनंदमय सच्चा लगा ।
जीवन की यात्रा में, समय की धारा के संग बहते हुये;
तेरा साथ चाहूँ, हर पल, मंझधार और किनारे का ध्यान किसे है ।
माना की जग में रहके सब व्यवहार करते है हम, पर दिल के –
अंदर ही अंदर तुझसे, कुछ बात कर लेते है, पल भर के लिये ।
कसूरवार तो है हम पाकें भी नहीं पा पातें है हम तुझको ;
फिर भी इनायत चाहते है तूझसें, बनकें दास तेरा जीवन गुजारना चाहते है ।


- डॉ.संतोष सिंह