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Hymn No. 152 | Date: 26-Apr-1998
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जग के कण – कण में तूम बसते हो ;
जग के कण – कण में तूम बसते हो ;
तो क्या प्रभु मेरे दिल में भी रहते हो ।
मेरा मन हर पल तूमसे जुडना चाहे ;
फिर क्यों रम जाता है, मेरा मन इस जग में ।
अनहोनी तो होती है तेरे जग में हर पल,
हमें तो इंतजार है अनहोनी का हमारे जीवन में ।
कोई भी प्रार्थना तुझसे की हुयी खाली ना जात,
समझते हुये समझा ना पा रहा हूँ दिल की ।
करीब रहता है तू हमारे, कब रहेगे तेरे हम,
प्यार करने की जगह समझना बेकार हो जाता है ।
- डॉ.संतोष सिंह
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