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Hymn No. 153 | Date: 25-Apr-1998
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अपलक निहारने का मन करता है तेरी छवि को;
अपलक निहारने का मन करता है तेरी छवि को;
यूँ ही तुझसे बतियाने का जी करता है मन ही मन में ।
हर बात में तेरी चर्चा निकल आती है न जाने कैसे;
तेरे नाम के जाम को पीते है, हम चाहे दिन हो या रात ।
जीवन का हर पल सुहाना हो गया है, जब से जुड गये हम तुझसे;
सुख हो या दुःख हर बात में अब आता है एक अलग मजा ।
पल भर के लिये जुदा होना ही है, सबसे बड़ी सजा मेरे लिये;
तनहा होना भी अच्छा लगता है, तेरी यादों के संग ।
मेरे ख्वाबों का सरताज तू है, तेरे बिन् अधूरी है जिंदगी;
जिंदा रहना है सिर्फ तेरे लिये, मौत आये तो सिर्फ तेरे लिये ।


- डॉ.संतोष सिंह