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Hymn No. 1554 | Date: 05-Feb-2000
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मन ही मन, मन ही मन गुनगुनाता हूँ गीत तेरा।
मन ही मन, मन ही मन गुनगुनाता हूँ गीत तेरा।
तेरी तरह आशिक मिजाज पाया नहीं, फिर भी करता हूँ प्यार।
यार तेरे सामने कोई औकात नहीं, फिर भी याद करके हूँ तड़पता।
कई बार देता हूँ अपने आपको झिड़की, क्यों नहीं लेता कोई सीख तुझसे।
तारी रहती है तुझपे खुमारी प्यार की, हमपे तेरे प्यार की।
बहुत कठिन है दिल का कहना करना, तेरे रंग में रंगके कर जायेगे।
अजब बात रहती है यार तेरे प्यार में, चाहके भी गजब ना ढा पाते तुझपे।
बहुत देखे – देखा नहीं दिलदार तुझसा, तेरे आगे खाक भी नहीं हम।
इक् बार से मिलता नहीं प्यार तेरा किसीको, मिलने के बाद छोड़ता ना किसीको।
अंग – अंग पे चढ़ जाये रंग तेरा, भंग करना चाहे कोई न पायें कभी।
- डॉ.संतोष सिंह
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दिल से निकले कोई गीत ऐसा, जो दूँ ले तेरे मन को।
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