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Hymn No. 1557 | Date: 07-Feb-2000
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निभाना है संसार के दायित्वों को, प्रार्थना करते हुये तेरी।
निभाना है संसार के दायित्वों को, प्रार्थना करते हुये तेरी।

मुँह ना चुराना है तेरे बताये हुये, कार्यों को पूरा करने से।

करते हुये सब कुछ अलग रहके, प्रभु तेरा बनके है जीना।

जीवन के सारे जहर को पीते हुये, करना है गुनगान दिल को।

राह होगी कितना भी कठिन गर, तूने बताया तो चलते है जाना।

दर्द होता रहे कितना तन – मन में, प्रभु का गीत गाते ही रहना।

मान – अपमान से परे है जीना, तन – मन से प्रभु का बनके।

आग लगे चाहे घर में, पल भर को ना छूटे आनंद से साथ।

बिगाड़ नहीं सकता कोई कुछ हमारा, जो दिल रमता रहेगा प्रभु में।

मिले या ना मिले बहुत कुछ, प्रभु के सिवाय ना दे सकता कोई सहारा।


- डॉ.संतोष सिंह