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Hymn No. 1558 | Date: 08-Feb-2000
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तेरे दर पे ना देर है ना अंधेर, सब कुछ जुड़ा है हमारे कर्मों से।
तेरे दर पे ना देर है ना अंधेर, सब कुछ जुड़ा है हमारे कर्मों से।
तू चाहता है उठाना हमको ऊपर, पर होनी का रोना रोके रहते है हम विवश।
तेरा सामीप्य देता है विश्वास – श्रध्दा, दूर होने पे माया के आग टेकते है घुटने।
खुद भी धोखा खाया कई - कई बार, बुरी बात हें, तुझको भी दिया हर बार।
वक्त हाथ से निकलने पे आँसू बहाये बहुत, मौका फिर जब मिला ज्यों के त्यों हुये।
पर उबरना है मुझको तेरे अवर्णनीय प्यार की खातिर, चाहे करना पड़े कुछ।
डर के बहुत जी लिया, बेधड़क हो जाने दे चाहे कुछ भी हो जाये जीवन में।
साथ छोड़ता है प्राण तो भी च्यूत् ना हो, तेरी ओंर जाते हूयें मार्ग से।
अब जो कुछ बचा है सौंप देना है तुझे, निश्चिंत हो जाने के वास्ते।
काश से ले लेना है अवकाश, वर्तमान ही वर्तमान में तेरे संग जीने के वास्ते।


- डॉ.संतोष सिंह